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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो जागर्ति देहिषु |  ९५   क
प्रय़त्नेनाप्यतिक्रान्तो दृष्टपूर्वो न केनचित् ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति