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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत् |  ११   क
सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद्भुवि |  ११   ख
आसक्तमन्यद्वृक्षेषु तदेवं पञ्चधापतत् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति