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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
अर्कपुष्पैस्तु ते पञ्च गणाः पूज्या धनार्थिभिः |  १४   क
व्याधिप्रशमनार्थं च तेषां पूजां समाचरेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति