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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
स संवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा |  २१   क
शुशुभे काञ्चने शैले दीप्यमानः श्रिय़ा वृतः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति