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शान्ति पर्व
अध्याय ५१
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वासुदेव उवाच
पञ्चाशतं षट्च कुरुप्रवीर; शेषं दिनानां तव जीवितस्य |  १४   क
ततः शुभैः कर्मफलोदय़ैस्त्वं; समेष्यसे भीष्म विमुच्य देहम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति