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आदि पर्व
अध्याय २२१
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वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पत यत्र न हव्यवाट् |  १२   क
अस्मासु हि विनष्टेषु भवितारः सुतास्तव |  १२   ख
त्वय़ि मातर्विनष्टाय़ां न नः स्यात्कुलसन्ततिः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति