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अनुशासन पर्व
अध्याय २६
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अङ्गिरा उवाच
नर्मदाय़ामुपस्पृश्य तथा सूर्पारकोदके |  ४७   क
एकपक्षं निराहारो राजपुत्रो विधीय़ते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति