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शान्ति पर्व
अध्याय १८४
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भृगुरु उवाच
दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च |  ३   क
सद्भ्यो यद्दीय़ते किञ्चित्तत्परत्रोपतिष्ठति ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति