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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
तच्च मे कृन्तते मर्म यन्न तस्य शिरो मय़ा |  ३५   क
निषादविषय़े क्षिप्तं जय़द्रथशिरो यथा ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति