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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
विषण्णं त्रस्तमुद्विग्नं भय़ार्तं व्याधिपीडितम् |  ४०   क
हृतस्वं व्यसनार्तं च नित्यमाश्वासय़न्ति ते ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति