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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
धर्ममेवान्ववर्तन्त न हिंसन्ति परस्परम् |  ४१   क
अनुकूलाश्च कार्येषु गुरुवृद्धोपसेविनः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति