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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
नैवाकाशे न पशुषु नाय़ोनौ न च पर्वसु |  ४४   क
इन्द्रिय़स्य विसर्गं तेऽरोचय़न्त कदाचन ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति