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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
नित्यं दानं तथा दाक्ष्यमार्जवं चैव नित्यदा |  ४५   क
उत्साहश्चानहङ्कारः परमं सौहृदं क्षमा ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति