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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
निद्रा तन्द्रीरसम्प्रीतिरसूय़ा चानवेक्षिता |  ४७   क
अरतिश्च विषादश्च न स्पृहा चाविशन्त तान् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति