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शान्ति पर्व
अध्याय ३००
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याज्ञवल्क्य उवाच
चतुर्विधं प्रजाजालं निर्दहत्याशु तेजसा |  ५   क
जराय़्वण्डस्वेदजातमुद्भिज्जं च नराधिप ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति