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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
यूनः सहसमासीनान्वृद्धानभिगतान्सतः |  ५१   क
नाभ्युत्थानाभिवादाभ्यां यथापूर्वमपूजय़न् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति