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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
विप्रकीर्णानि धान्यानि काकमूषकभोजनम् |  ५८   क
अपावृतं पय़ोऽतिष्ठदुच्छिष्टाश्चास्पृशन्घृतम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति