शान्ति पर्व  अध्याय २२१

श्रीरु उवाच

पाय़सं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुलीः |  ६२   क
अपाचय़न्नात्मनोऽर्थे वृथामांसान्यभक्षय़न् ||  ६२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति