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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
अनार्याश्चार्यमासीनं पर्युपासन्न तत्र ह |  ६४   क
आश्रमस्थान्विकर्मस्थाः प्रद्विषन्ति परस्परम् |  ६४   ख
सङ्कराश्चाप्यवर्तन्त न च शौचमवर्तत ||  ६४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति