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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
ये च वेदविदो विप्रा विस्पष्टमनृचश्च ये |  ६५   क
निरन्तरविशेषास्ते वहुमानावमानय़ोः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति