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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
हावमाभरणं वेषं गतिं स्थितिमवेक्षितुम् |  ६६   क
असेवन्त भुजिष्या वै दुर्जनाचरितं विधिम् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति