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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
तत्र वेदविदः प्राज्ञा गाम्भीर्ये सागरोपमाः |  ७३   क
कृष्यादिष्वभवन्सक्ता मूर्खाः श्राद्धान्यभुञ्जत ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति