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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
श्वश्रूश्वशुरय़ोरग्रे वधूः प्रेष्यानशासत |  ७५   क
अन्वशासच्च भर्तारं समाहूय़ाभिजल्पती ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति