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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
यत्राहं तत्र मत्कान्ता मद्विशिष्टा मदर्पणाः |  ८१   क
सप्त देव्यो मय़ाष्टम्यो वासं चेष्यन्ति मेऽष्टधा ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति