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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
अश्रुत्वा ह्यस्य वीरस्य वाक्यानि मधुराण्यहम् |  १८   क
फलं प्राप्य महद्दुःखं निमग्नः शोकसागरे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति