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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
पट्टिशं त्वन्वगाद्राजंश्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् |  १३   क
कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसंवृतः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति