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भीष्म पर्व
अध्याय १०४
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सञ्जय़ उवाच
अहत्वा समरे भीष्मं यदि यास्यसि मारिष |  ५२   क
अवहास्योऽस्य लोकस्य भविष्यसि मय़ा सह ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति