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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
गौरी विद्याथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्वय़ा |  २०   क
सावित्र्या सह सर्वास्ताः पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः ||  २०   ख
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अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति