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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
स गृहीत्वा पताकां तु यात्यग्रे राक्षसो ग्रहः |  २२   क
व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा |  २२   ख
पिङ्गलो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददाय़कः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति