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वन पर्व
अध्याय २२१
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रुद्र उवाच
कार्येष्वहं त्वय़ा पुत्र सन्द्रष्टव्यः सदैव हि |  २८   क
दर्शनान्मम भक्त्या च श्रेय़ः परमवाप्स्यसि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति