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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा विससर्जैनं परिष्वज्य महेष्वरः |  २९   क
विसर्जिते ततः स्कन्दे वभूवौत्पातिकं महत् |  २९   ख
सहसैव महाराज देवान्सर्वान्प्रमोहय़त् ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति