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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ते पिवन्त इवाकाशं त्रासय़न्तश्चराचरान् |  ३   क
सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्चारुकेसराः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति