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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढं भुवनं भृशम् |  ३०   क
चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगत्प्रभो ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति