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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तद्दारुणं दृष्ट्वा क्षुभितः शङ्करस्तदा |  ३१   क
उमा चैव महाभागा देवाश्च समहर्षय़ः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति