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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ते विभिन्नशिरोदेहाः प्रच्यवन्ते दिवौकसः |  ३८   क
न नाथमध्यगच्छन्त वध्यमाना महारणे ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति