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द्रोण पर्व
अध्याय ८४
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सञ्जय़ उवाच
ततो निनादः सुमहान्समुत्थितः; सशङ्खनानाविधवाणघोषवान् |  ३०   क
निशम्य तं प्रत्यनदंस्तु कौरवा; स्ततो ध्वनिर्भुवनमथास्पृशद्भृशम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति