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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
जय़तैनान्सुदुर्वृत्तान्दानवान्घोरदर्शनान् |  ४१   क
अभिद्रवत भद्रं वो मय़ा सह महासुरान् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति