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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तेषां देहान्विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा |  ४५   क
निष्पतन्तो अदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति