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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तद्दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि |  ४७   क
त्रासितं विविधैर्वाणैः कृतं चैव पराङ्मुखम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति