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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
तथास्तु कृष्णेत्यभिनन्द्य वाक्यं; धनञ्जय़ः प्राह धनुर्विनाम्य |  ९२   क
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठं; शृणुष्व राजन्निति शक्रसूनुः ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति