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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अनय़ो देवलोकस्य सहसैव व्यदृश्यत |  ५०   क
तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति