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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथ तैर्दानवैः सार्धं महिषस्त्रासय़न्सुरान् |  ५५   क
अभ्यद्रवद्रणे तूर्णं सिंहः क्षुद्रमृगानिव ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति