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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रं रुद्रस्य नानदत् |  ६१   क
देवान्सन्त्रासय़ंश्चापि दैत्यांश्चापि प्रहर्षय़न् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति