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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तस्मिन्भय़े घोरे देवानां समुपस्थिते |  ६२   क
आजगाम महासेनः क्रोधात्सूर्य इव ज्वलन् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति