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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
रथमादित्यसङ्काशमास्थितः कनकप्रभम् |  ६४   क
तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत्सहसा रणे ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति