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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम् |  ६५   क
मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महावलः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति