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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
दानवान्भक्षय़न्तस्ते प्रपिवन्तश्च शोणितम् |  ६९   क
क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति