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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः |  ७५   क
अजेय़स्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति