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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतत्ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति |  ७६   क
त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय़्या भविष्यति |  ७६   ख
वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव सुरात्मज ||  ७६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति