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आदि पर्व
अध्याय १३७
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वैशम्पाय़न उवाच
एवङ्गते मय़ा शक्यं यद्यत्कारय़ितुं हितम् |  १४   क
पाण्डवानां च कुन्त्याश्च तत्सर्वं क्रिय़तां धनैः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति